● छन्द वेद पुरुष का पैर हे ( छन्दः पादौ तु वेदस्य ) ।
● छन्दःशास्त्र के प्रणेता पिङ्गलाचार्य हैं ।
● छन्द दो प्रकार के होते है
१. वार्णि कछन्द और २.मात्रिकछन्द ।
● जिन छन्दों की गणना वर्णों क
आधार पर होती हैं वे वार्णिक छन्द कहे
जाते हैं । जेसेन – अनुष्टुभ् , इन्द्रवज्रा, इत्यािद ।
● जिन छन्दों की गणना मात्रा (ह्रस्व, दीर्घ ) के
आधार पर होती है वे मात्रिक छन्द कहे
जाते हैं । जेसे – आर्या इत्यािद ।
मात्रिक छन्द
आर्या
यस्याः पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि। अष्टादश
द्वितीये चतुर्थके पञ्चदश साऽर्या ।।
प्रथमपाद -१२ मात्रा , द्वितीयपाद – १८ मात्रा , तृतीयपाद – १२ मात्रा , चतुर्थपाद – १५
मात्रा वाला छन्द आर्या कहा जाता हे
उदाहरण
S I I S S I I S , I S I S S I S I S S S
आपरितोषाद्विदुषां, न साधु मन्ये प्रयोगिवज्ञानम्।
I I I I I S I S S , S S S S I S S S
बलवदिप शिक्षितानाम, आत्मन्यप्रत्ययंचेतः ।।
वार्णि क छन्द
● वार्णि क छन्द ३ प्रकार के होते हैं ।
१ समवृत्त – जिनके सभी चरणों के वर्ण समान हों वे समवृत्त कहे जाते हैं । जेसे अनुष्टुभ,
इन्द्रवज्रा इत्यािद ।
● २ अर्धसमवृत्त – जेनके प्रथम पाद के समान तृतीय पाद तथा द्वितीय पाद के समान चतुर्थ पाद हो ऐसे छन्द अर्धसमवृत्त कहे जाते हैं । जेसे वयोिगनी इत्यािद ।
● ३ विषमवृत्त – जिनके सभी चरणों के वर्ण असमान (अलग-अलग) हों ऐसे छन्द विषमवत्त कहे जाते हैं । जेसे– चतुरूर्ध्व इत्यािद ।
लघु गरुुविचार
सानुस्वारो विसर्गान्तो दीर्घो युक्तुपरश्च यः।
वा पादान्ते गरुर्ज्ञेयो ज्ञेयोऽन्यो मात्रिको लघुः॥
अनुस्वार से युक्त ( अं कं खम् इत्यादि), विसर्गान्त (अः कः खः इत्यािद), दीर्घ ( आ ई ऊ का की इत्यािद), जिसके पर में संयोग हो (कृष्ण , विष्णु इत्यािद) ऐसे वर्ण गुरु हैं ।
पदान्त में स्थित वर्ण ( चाहे वह ह्रस्व या दीर्घ केसा भी हो) विकल्प से गुरु माना जाता है। इससे
अन्य जो भी है ऐसा १ मात्रा वाला लघु माना जाता है।
गुरु = S (२ मात्रा) , लघु= I (१ मात्रा)
गण
सुत्र– य मा ता रा ज भा न स ल गा ।
१- यगणः यमाता ।ऽऽ ५- जगणः जभान ।ऽ।
२- मगणः मातारा ऽऽऽ ६- भगणः भानस ऽ।।
३- तगणः ताराज ऽऽ। ७- नगणः नसल ।।।
४- रगणः राजभा ऽ।ऽ ८- सगणः सलगा ।।ऽ
आिदमध्यावसानेषु भजसा यान्ति गौरवम्।
यरता लाघवं यान्ति मनौ तु गुरुलाघवम॥

