मनुस्मृतिः
प्रथमोऽध्यायः
मनुमेकाग्रमासीनमभिगम्य महर्षयः।
प्रतिपूज्य यथान्यायमिदंवचनमब्रुवन्।।१।।
भगवन्सर्ववर्णानांयथावदनुपूर्वशः ।
अन्तरप्रभावाणांच धर्मान्नो वक्तुमर्हसि।।२।।
शब्दार्थः - मुनिगण शान्ति सेएकाग्रचित्त बैठेहुयेमनुजी के समक्ष उपस्थित होकर यथाक्रम सेपूजन करके बोले - हेभगवन ! सभी वणों एवं जातियों के धर्मानुसार जैसी जैसी धर्मव्यवस्था है , उसेआप ही हम लोगों सेकहनेमेसमर्थहैं, अत: कहने की कृ पा करें॥ १ -२ ॥
अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य कार्यतत्त्वार्थवित्प्रभो।।३।।
प्रत्युवाचार्च्यतान्सर्वान्महर्षीञ्छ्रूयतामिति।।४।।
शब्दार्थः - हेप्रभो ! आप ही स्वतः उत्पन्न होनेवालेअचिन्त्य एवं अप्रमेय सम्पूर्णब्रह्म (जगत्) के क्रियाकलाप के तत्व तथा अर्थ के ज्ञाता हैं। तब मुनिगणों द्वारा इस प्रकार प्रश्न करनेपर उनका अभिनन्दन करकेपरम तेजस्वी मनुजी बोले - हेमहर्षियों ! सुनिये॥ ३ - ४ ॥
अप्रतर्क्यमविज्ञेयंप्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ ५ ॥
महाभूतादि वृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः ।।६।।
शब्दार्थः - यह जगत पूर्वमेंअंधकार रूप प्रकृति सेपरिवेष्टित था, इस कारण प्रत्यक्ष का ज्ञान न होनेसे , अनुमान करनेयोग्य कोई स्वरूप दृष्टिगोचर नहीं होता था, जिससेकि तर्क द्वारा लक्षण स्थिर किया जा सके । सर्वत्र सुषुप्ति अवस्था के कारण अविज्ञात था । तत्पश्चात्इस अवस्था (प्रलयाक्स्था ) के विनाशकरनेएवं सृष्टि - सामर्थ्यमेंसक्षम अव्यक्त स्वयंभूभगवान पंचमहाभूतो पृथ्वी , जल, अग्नि, वायुऔर आकाश ) को प्रकट करतेहुयेव्यक्त हुये॥ ५ - ६ ॥
सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एवंस्वंमुद्बभौ।।७।।
अत एव ससर्जाऽऽदौ तासुबीजमवासृजत्।।८।।
शब्दार्थः - सूक्ष्मातिसूक्ष्म , अव्यक्त सनातन वाह्येन्द्रियों केज्ञान से परेसमस्त जीवों मेंव्याप्त (सव व्यापी ) अचिन्त्य रुप परमात्मा स्वयं प्रादुर्भूत हुये। उन्होंनेअनेक प्राणियों केउत्पन्न करनेकी इच्छा से सर्वप्रथम अपनेशरीर सेजल की सृष्टि कर उसमेंबीजकी उत्पत्ति किया ॥ ७ - ८ ॥
तस्मिञ्जज्ञेस्वयंबह्मा सर्वलोकपितामहः ॥ ९ ॥
ता यदस्यायनंपूर्वंतेन नारायणः स्मृतः ॥ १० ॥
शब्दार्थः - बह बीज सूर्यकेसदृश परम तेजस्वी सुवर्णका अंडा हो गया। उसमेंसेसर्वलोकों के उत्पन्न कर्त्तास्वयंब्रह्माजी प्रादुर्भूत हुये। चूँकि नर अर्थात्ईश्वर सेजल की उत्पत्ति हुई , अतः जल को नार भी कहा जाता हैवह नार जिसका सृष्टि सृजन मेंपहलेअयन उद्भव ) हुआ इस कारण उनका नाम नारायण हुआ ॥ ९ - १० ॥
तद्विसृष्टः स पुरुषो लोकेब्रह्मेति कथ्यते॥ ११ ॥
स्वयमेवाऽऽत्मनो ध्यानात्तदण्डमकरो्द्विधा ॥ १२॥
शब्दार्थः - सम्पूर्णसृष्टि केकारण , अव्यक्त, नित्य सत असत्स्वरूप सेजिस पुरुष की उत्पत्ति हुई उसेसंसार मेंब्रह्मा कहा जाता है। अपनेदिनमान ) सेवर्षपर्यन्त उस अण्ड मेंरहकर ब्रह्मा नेस्वयं अपनेही ध्यान सेउस अण्डेका दो खण्ड कर दिया ॥ ११- १२ ॥
मध्येव्योम दिशश्चाष्टावपांस्थानंच शाश्वतम्॥ १३ ॥
मनश्चाप्यहंकारमभिमन्तारमीश्वरम्॥ १४ ।।
शब्दार्थः - उन्होनेंदोनों खण्डों सेस्वर्ग, पृथिवी तथा मध्य मेंआकाश आठ दिशायेंऔर आठ जल स्थान (सागर ) का निर्माण किया । तत्पश्चात्सत्असत्स्वरूप आत्मा सेमन को फिर परमात्मा (ईश्वर) सेभी अभिमान करनेवालेअहंकार तत्व को बनाया ॥ १३- १४ ॥
विषयाणांग्रहीतृणि शनैः पंचेन्द्रियाणि च ॥ १५ ॥
सन्निवेश्याऽऽत्ममात्रासुसर्वभूतानि निर्ममे॥ १६ ॥
शब्दार्थः - फिर त्रिगुण (सत्व,रजः,तम्) को आत्म स्वरूप केज्ञानार्थ बनाया और विषयों को ग्रहण करनेवाली पंच इन्द्रियों का निर्माण शनै: शनैः किया । तत्पश्चात्अति तेजस्वी इन षट सूक्ष्म अवयवों को उन्ही के सूक्ष्म विकारों मेंसन्निविष्ट करकेसर्वभूतों (समस्त प्राणियों ) के रचना की ॥ १५- १६॥
तस्माच्छरीरमित्याहुस्तस्य मूर्तिं मनीषिणः ॥१७ ॥
मनश्चावयवैः सूक्ष्मैः सर्वभूतकृ दव्ययम्॥१८ ॥
शब्दार्थः - इस मूर्ति अर्थात्ब्रह्मा मेंयेषट्सूक्ष्म अवयव आश्रय लेतेहैं, इससेमनीषिगण इस ब्रह्मा मूर्ति को शरीर कहतेहैं। इसी बब्रह्म मेंपंच महाभूत स्व स्व कर्मो सहित उत्पन्न होतेहै। इसी अहंकार रूप) ब्रह्म में सभी प्रापियों का निमित्त अव्यय मन अपनेसूक्ष्म अवयवों सहित उत्पन्न होता है॥ १७ - १८ ॥
सूक्ष्माभ्यो मूर्तिमात्राथ्यः संभवत्यव्याद्व्ययम्।।१९।।
आद्याद्यस्य गुणंत्वेषामवाप्नोति परः परः ।
यो यो यार्वातिथश्चैषांस स तावद्गुणः द्गु स्मृतः ॥ २० ॥
शब्दार्थः - अमित तेजस्वी इन (महत्तत्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्रा ) सात तत्वों केशरीर बननेवालेभागों सेसत् असत् (नश्वर) जगत अव्यय सेउत्पन्न होता है। इन पञ्चमहाभूतों केपाँच गुण उत्तरोत्तर एकाधिक होतेहैं।
जैसे - आकाश केएक गुण " शब्द” तथा वायुमेंदो गुण - " शब्द एवंस्पर्श " | इसी प्रकार रुप , रस, गन्ध आदि की वृद्धि उत्तरोत्तर होती जाती हैऔर पञ्चभूतों केसंख्या केअनुसार ही उनमेंगुणेकी संख्या भी क्रमशः अधिक होती है॥ १९ - २० ॥
वेदशब्देभ्य एवाऽऽदौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे॥ २१ ॥
साध्यानांच गणंसूक्ष्मंयज्ञंचैव सनातनम्।।२२ ॥
शब्दार्थः - ईश्वर नेसृष्टि केआरम्भ मेंही उनकेनाम एवंकर्मवेद वाक्यों केअनुसार निर्धारित कर उनके भिन्नभिन्न विभाग बना दिये। ब्रह्मा नेदेवगणों एवंसभी जीवों की , सूक्ष्म साध्यगणों एवंसनतन यज्ञो की सृष्टि की ॥ २१ - २२ ॥
दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुः सामलक्षणम्॥२३ ॥
सरितः सागरच्छैलान्समानि विषमाणि च ॥ २४ ॥
शब्दार्थः - ब्रह्मा नेयज्ञ हेतुअग्नि , वायुऔर सूर्यइन तीनों सेसनातन ऋग्वेद यर्जुवेद एवंसामवेद को दोहन कर प्रकट किया । तत्पश्चात्काल का विभाग ( दिन , पक्ष , मासादि ) मेंकिया तथा ग्रह नक्षत्र , सरिता ,सागर , पर्वत और सम व विषम भूमि की रचना की i २३ - २४ ॥
सृष्टिं ससर्जंचैवमांस्त्रष्टुमिच्छन्निमाः प्रजाः ॥ २५ ॥
द्वन्द्वैरयोजयच्चेमाः सुखदुः खादिभिः प्रजाः ॥ २६ ॥
शब्दार्थ: - पूर्वकथित देवताओ एवंअन्य को रचना करनेकी इच्छा से तप ( तपस्या पूजा) वाणी , चित्त , परितोष की इच्छा तथा चित्त के विकारादि का सृजन कर सृत्ति सर्जन किया । ब्रह्मा नेधर्मऔर अधर्म विषयक कर्तव्याकर्तव्य के विचार हेतुधर्मएवंअधर्मको क्रमश: इनके फल सुख , दुः खादि को पूजा मेंही समाहित कर दिया ॥ २५ - २६ ॥
ताभिः सार्धमिदंसर्वसंभवत्यनुपूर्वशः ॥ २७ ॥
स तदेव स्वयंभेजेसृज्यमानः पुनः पुनः ॥ २८ ॥
शब्दार्थः - पञ्चमहाभूतों की नाशवान पञ्चतन्मात्राओं जिसेरूप , रस, गन्ध, घ्राण एवंस्पर्शकहा जाता हैकेसाथ ही यह समस्त जगत सूक्ष्म से स्थूल एवंस्थूल सेस्थूलतर उत्पन्न होता है। पूर्वमेंब्रह्मा नेजिस जीवको जिस कार्यहेतुनियुक्त किया , वह पुनः पुनः उत्पन्न होकर पूर्वकृ त अपने - अपनेकर्ममेंप्रवृत्त होनेलगा ॥ २७ - २८ ॥
यद्यस्य सोऽद्धात्सर्गेतत्तस्य स्वयमाविशत्॥ २९ ॥
स्वानि स्वान्यभिपद्यन्तेतथा कर्माणि देहिनः ॥ ३० ॥
शब्दार्थः - हिंसक एवंअहिंसक , मृदु एवंकठोर , धर्मसम्मत एवंअधर्म युक्त सत्य एवंअसत्यपरक इनमेंसेजिसेकार्यमेंनियोजित किया वह उसमें प्रवृत्त होनेलगा । जिस प्रकार एक ऋतुकेसमाप्तप्राय होनेपर दूसरी ऋतु अपनेविशेष चिह्नो को प्रकट करती है, उसी प्रकार अपनेअपनेकमों को जीव जन्मजात ही प्राप्त करतेहैं॥ २९ - ३० ॥
ब्राह्मणंक्षत्रियंवैश्यंशूद्रंच निरवर्त्तयत्।।३१।।
अर्धेन नारी तस्यांस विराजमसृजत्प्रभुः।।३२।।
शब्दार्थः - जगत्के विस्तार हेतुब्रह्मा ने ) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र की उत्पत्ति क्रमश: मुख, बाहु, जंघा एवंचरण सेकिया। पुनः अपनी देह केदो भाग करकेअर्धभाग सेपुरुष और आधेसेस्त्री की उत्पत्ति करके विराट ्पुरुष का सृजन किया ॥ ३१ - ३२ ॥
तंमांवित्तास्य सर्वस्य स्रष्टारंद्विजसत्तमाः ॥ ३३ ॥
पतीन्प्रजानामसृजंमहर्षीनादितो दश।।३४।।
शब्दार्थः - उस विराट ्पुरुष नेस्वयंतप काके जिस समस्त जगत केसर्जक) को उत्पन्न किया, हेद्विजश्रेष्टों ! वह मैंही हूँ। मैंनेअत्यन्त कठोर तप करकेसृष्टि के सृजन की इच्छा सेप्रजाओ ंकेपति दस महान ऋषियों को उत्पन्न किया ॥ ३३ -३४ ॥
प्रचेतसंवसिष्ठं च भृगुंनारदमेव च ॥ ३५ ॥
देवान्देवनिकायांश्च महर्षींश्चामितौजसः ॥ ३६ ॥
शब्दार्थः -मरीचि,अत्रि, अङ्गि रा,पुलस्त्यः,पुलहः,क्रतु,प्रचेता, वशिष्ट , भृगुएवंनारद येनाम उन दस महर्षियों केहैं। इन महा तेजस्वी महर्षियों नेअपनेतेज सेसप्त मनुओ देवताओ ंको उनके निकायों सहित तथा अत्यन्त तेजस्वी ऋषियों का सृजन किया ॥ ३५ - ३६ ॥
नागान्सर्पान्सुपर्णांश्च पितृणांच पृथग्गणान्॥ ३७
उल्कानिर्घातके तूंश्च ज्योतींष्युच्चावचानि च ॥ ३८ ॥
शब्दार्थः - यक्ष, राक्षस , पिशाच , गन्धर्व, असुर , नाग - सर्पसुपर्ण एवंभिन्नभिन्न पितृगणों को बनाया । (आकाशीया) विद्युत, वज्र, मेघ , रोहित, इन्द्रधनुष, उल्का , मेघों, की गड़ - गड़ाहट , के तु (तायगण ) एवं लघुदीर्घनक्षत्रों का निर्माण किया ॥ ३७ - ३८ ॥
पशून्मगान्मनुष्यांश्च व्यालांश्चोभयतोदतः।।३९।।
सर्वंच दंदमशकं स्थावरंच पृथग्विधम्।।४०।।
शब्दार्थः - किन्नरो , बन्दरो विविध प्रकार की मछलियों , पक्षियों, पशुओं ,मृगों, मनुष्यो एवंदोनों ओर ( ऊपर - नीचे ) दाँत वाले सिंहादिकों , कृमि,कीट , पतङ्ग ‘ जोंक , मक्खी मच्छर तथा अनेकप्रकार केस्थावर जीवों की उत्पत्ति की ॥ ३९ - ४० ॥
यथाकर्मतपोयोगात्सृष्टंस्थावरजंगमम्।।४१।।
तत्तथा वोऽभिधास्यामि क्रमयोगंच जन्मनि ॥४२ ॥
शब्दार्थः - उन महात्माओं नेमेरी आज्ञा पर अपनेतप - बल सेकर्म केअनुसार स्थावर तथा जंगम जीवों का सृजन किया । जिस प्राणी केजैसेकर्मसृष्टि मेंकहेगयेहैं, उनके विषय मेंजन्म के क्रम योग सेआपसे) कहता हूँ॥ ४१ -४२ ॥
रक्षांसि च पिशाचांश्च मनुष्याश्च जरायुजाः।।४३।।
यानि चैवंप्रकाराणि स्थलजान्यौदकानि च।।४४।।
शब्दार्थः -ऊपर नीचेदाँतो वालेपशु, मृग, हिंसक जीव, राक्षस , पिशाच एवंमनुष्य येजरायुज अर्थात्गर्भसेउत्पन्न होनेवालेहोतेहै। पक्षी सर्प, घड़ियाल , मछली एवंकुछुआ आदि जितनेस्थल और जल के जीव ह हैंवह अंडज अर्थात अण्डेसेउत्पन्न होनेवालेहोतेहैं॥ ४३-४४ ॥
उष्मणश्चोपजायन्तेयच्चान्यत्किञ्चिदीदृशम्।।४५।।
ओषध्यः फलपाकान्ताः बहुपुष्पफलोपगाः।।४६।।
शब्दार्थः - डंस मच्छर जोंक मक्खी खटमल आदि जो इस प्रकार केजीव है , जो ऊष्मा (गर्मी ) सेउत्पन्न होतेहैं, वेसभी स्वेदज कहलातेहैं। जो जीव एवंशाखा सेउत्पन्न होनेवालेधरती केबीज हैंवेसब उद्भिज कहलातेहैं। वृक्षों मेंलगनेवालेकल जो पक जानेपर सुख जातेहैंतथा अन्य पुष्प व फल वालेजो अनेक वृक्ष हैवेऔषधि कहेजातेहैं॥ ४५- ४६ ॥
पुष्पिणः फलिनश्चैव वृक्षास्तूभयतः स्मृताः ॥ ४७ ॥
बीजकाण्डरूहाण्येव प्रताना वल्ल्य एव च।।४८।।
शब्दार्थः - जो पुष्प के बिना ही फलतेहैंउन्हेवनस्पति कहा जाता हैतथा जो फू लतेफलतेहैंवेवृक्ष कहलातेहैं। विविध प्रकार केगुच्छ , गुल्म ,तृण एवंफै लनेवाली लतायें , बीज तथा शाखा सेपैदा होतेहैं॥ ४७-४८ ॥
अतः संज्ञा भवन्त्येतेसुखदुः ख समन्विताः ॥ ४९ ॥
घोरेऽस्मिन्भूतसंसारेनित्यंसततयायिनि ॥ ५० ॥
शब्दार्थ:- पूर्वजन्मार्जित अनेक प्रकार केकर्मो केफलस्वरूप तमोगुण सेआवेष्टित रहतेहै। इनकेअन्दर चेतना तथा सुख दुः ख की अनुभूति विद्यमान रहती है। झ्स अचिन्त्य घोर चराचर जगत मेंब्रह्मादि सेआरम्भ कर यहाँतक केचरादि की उत्पत्ति के विषय मेंकहा गया ॥ ४९ - ५० ॥
आत्मन्यन्तर्दधेभूयः कालंकालेन पीडयन्॥ ५१ ॥
यदा स्वपिति शान्तात्मा तदा सर्वनिमीलति ॥५२ ॥
शब्दार्थः- इस सम्पूर्णजगत एवंमुझेउत्पन्न करनेकेपश्चात्वह अचिन्त्य पराक्रमी इस सृष्टिकाल को प्रलयकाल सेविनष्ट कर अपनेस्वरूप मेंलीन हो जाता है। जब वह जागृत होता हैतब यह जगत जागृत होता हैतथा जब शान्तचित्त होकर शयन करता हैतब सब का लय हो जाता है॥ ५१-५२ ॥
स्वकर्मभ्यो निवर्तन्तेमनश्च ग्लानिमृच्छति ॥ ५३ ॥
तदायंसर्वभूतात्मा सुखंस्वपिति निर्वृतः ॥ ५४ ॥
शब्दार्थ:-उसकेसुस्थिर होकर शयन करनेपर स्व स्व कर्मानुसार शरीरधारी जीव स्व स्व कर्मों सेनिवृत्त हो जातेहैंतथा उनका चित्त भी वृत्ति रहित हो जाता है। इस प्रकार जब सभी जीवों का लय उस परमात्मा मेंहो जाता हैतब सभी जीवधारियों की आत्मा (सांसारिक विषयों से ) निवृत्त होकर सुख सेशयन करती हैं॥ ५३-५४ ॥
न च स्वंकु रतेकर्मतदोत्क्रा मति मूर्तितः।।५५।।
समाविशति संसृष्टस्तदा मूर्ति विमुञ्चति ॥ ५६ ॥
शब्दार्थ : - यह जीव तमोगुणेसेआच्छादित होकर इन्द्रियों केसाथ रहता हैऔर जब यह अपनेकर्मसेविरत हो जाता हैतब पूर्वशरीर वहिर्गमन कर जाता है। फिर जब यह अणुमात्र होकर स्थावर जंगम के बीज मेंप्रविष्ट होता हैतब स्थूल शरीर को धारण करता है॥ ५५ - ५६ ॥
सञ्जीवयति चायस्त्रंप्रमापयति चाव्ययः ॥ ५७ ॥
विधिवद्ग्राहयामास मरीच्यादींस्त्वहंमुनीन्।।५८।।
शब्दार्थः -वह अविनाशी इस प्रकार इस सम्पूर्णचराचर जगत को जागृत एवंस्वप्नावस्था द्वारा बारम्बा र उत्पन्न तथा नाश विनष्ट) करता है । ब्रह्मा जी नेइस शास्त्र की रचना करकेसर्वप्रथम विधिपूर्वक मुझेबताया तत्पश्चात्मैंनेही मरीचि आदिक महषियों को बताया ॥ ५७- ५८ ॥
एतद्धि मतोऽधिजगेसर्वमेषोऽखिलंमुनिः ॥ ५९ ॥
तानब्रवीदृषीन्सर्वान्प्री तात्मा श्रूयतामिति ॥ ६० ॥
शब्दार्थ:-महर्षि भृगुइस सम्पूर्ण शास्त्र को आपको सुनायेंगेक्योंकि इन्होंनेयह सम्पूर्णशास्त्र मुझसेसी खा है। महर्षि मनुद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर भृगुजी प्रसन्नचित्त होकर त्रषियों सेबोलेकि आप लोग ध्यान पूर्वक सुनिये॥ ५९-६० ॥
सृष्टवन्तः प्रजाः स्वाः स्वा महात्मानो महौजस: ॥ ६१ ॥
चाक्षुषक्षुश्च महातेजा विवस्वत्सुत एव च ॥ ६२ ॥
शब्दार्थ:- इस स्वायंभुव मनुकेवंश मेंछः मनुहुये। इन महातेजस्वी महाताओनेअपनी - अपनी प्रजा को उत्पन्न किया । स्वरोचिष , उत्तम , तामस, रैवत ,चाक्षुषक्षु और महातेजस्वी सूर्य - पुत्र वैवस्वत छठेमनुहुये॥ ६१- ६२ ॥
स्वेस्वेऽन्तरेसर्वमिदमुत्पाद्याऽऽपुश्चराचरम्।।६३।।
त्रिंशत्कला मुहूर्तः स्यादहोरात्रंतुतावतः ॥ ६४ ॥
शब्दार्थः - येमहातेजस्वी स्वायंभुवादि सात मनुओं नेअपने - अपने समय मेंचराचर जगत को उत्पन्न किया। .अठारह निमेष ( निमेष- पलक गिरनेका समय ) का एक काष्टा , तीस काष्ठा कीएक कला , तीस कला का एक मुहूर्तऔर तीस मुहूर्तका एक अहोरात्र होता है॥ ६३ ६४ ॥
रात्रिः स्वप्नाय भूतानांचेष्टायैकर्मणामह : ॥ ६५ ॥
कर्मचेष्टास्त्वहः कृष्णः शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी।। ६६ ॥
शब्दार्थ:-सूर्यमनुष्य और देवताओं केअहोरात्र ( दिनरात ) का विभाजन करता है। प्राणियों केशयन हेतुरात्रि और कार्यसम्पादन हेतुदिन है। मनुष्यों केमास ( एक महीने ) केबराबर पितरों का एक रात - दिन ( अहोरात्र ) होता है ; एक मास मेंदी पक्ष होतेहैं ; मनुष्यों का कृष्णपक्ष पितरों केकार्यसम्पादन का दिन और शुक्ल पक्ष पितरों केशयन करनेको रात्रि होती है ॥ ६५-६६ ॥
अहस्तत्रोदगयनंरात्रिः स्याद्दक्षिणायनम्॥ ६ ७ ॥
एकै कशो युगानांतुक्रमशस्तन्निबोधत ॥ ६८ ॥
शब्दार्थ:-मनुष्यों केएक वर्षकेबराबर देवताओं का अहोरात्र होता है। उत्तरायण ( मकर सेछः राशि पर्यन्त अर्थात्मिथुन तक सूर्यके रहते ) दिन और दक्षिणायन ( कर्क सेधनुतक सूर्यके रहते ) देवताओं की रात्रि होती है। ब्रह्मा के रात दिन का ( एक एक युग का ) जो प्रमाण हैवह क्रमश: इस प्रकार है॥ ६७ - ६८ ॥
तस्य तावच्छती सन्ध्या संध्यांशश्च तथाविधः।।
एकापायेन वर्तन्तेसहस्राणि शतानि च ।। ७० ॥
चार हजार वर्षों का कृ तयुग (सतयुग ) होता है। युगारम्भ और युगान्त मेंक्रम सेचार - चार सौ वर्षकी सन्धा और संध्यांश होतेहैं। अन्य तीनों युगों का मान उत्तरोत्तर एक सेदुसरेकी बर्षकी संख्या मेंएक एक घटानेसेहोता हैऔर उतनेही ( युग केवर्षकी संख्या केप्रमाण) सौ वर्षउनकेसंध्या और संध्यांश होतेहैं। जैसेतीन हजार वर्षका त्रेता और तीन तीन सौ वर्षका संध्या - संध्यांश । दो हजार वर्षका द्वापर और दो दो सौ वर्षका संध्या संध्यांश , एक हजार वर्षका कलि युग और एक - एक सौ वर्षका संध्या - संध्यांश होता है॥ ६९-७० ॥
एतद्द्वादशसाहस्रंदेवानांयुगमुच्यते।।७१।।
ब्राह्ममेकमहर्ज्ञेयंतावतीं रात्रिमेव च।।७२।।
शब्दार्थ:-पहलेजो चतुर्युग ( चारों युगों ) का प्रमाण कहा गया हैइन
सबको मिला देनेसंध्या - संध्यांश सहित बारह हजार वर्षहुये। इसी को
महायुग कहतेहैंऔर यही देवताओ ंका युग है। देवताओ ंकेएक सहस्र युगों
का ब्रह्मा का एक दिन और उतनेयुगों की एक रात्रि होती है॥ ७१- ७२ ॥
और इतनेही प्रमाण का देवताओं का दिन या दिव्य दिन होता है। दोनों संख्यायों सहित दिव्य वर्षों में सौर वर्षों में
सत्य युग का मान ४८०० १७२८०००
त्रेता युग का मान ३६०० १२९६०००
द्वापर युग का मान २४०० ८६४०००
कलि युग का मान १२०० ४३२०००
सत्य + त्रेत्रा + द्वापर + कलि = महायुग = १२००० = ४६२००००
रात्रिं च तावतीमेव तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ ७३ ॥
प्रतिबुद्धश्च सृजति मनः सदसदात्मकम्॥ ७४ ॥
शब्दार्थ:-जो एक सहस्र युग ब्रह्मा केपवित्र दिन और उतनेही युग प्रमाण रात्रिमान को जानता हैवही यर्थाथ रुप मेंरात - दिन को जानता है। वह सुषुप्त ब्रह्मा अपनेअहोरात्र केअन्त मेंजागृत होकर सत असत् स्वरूप मन को सृष्टि केसृजन मेंलगातेहैं॥ ७३ - ७४ ॥
आकाशंजायतेतस्मात्तस्य शब्दंगुणंविदुः ॥ ७५ ॥
बलवाञ्जायतेवायुः स वैस्पर्शगुणो मतः।।७६।।
शब्दार्थ:-सृष्टि सर्जन की इच्छा सेमन सृष्टि करता है। उससे ( व्योम) आकाश की उत्पत्ति होती हैजिसका गुण शब्द कहा जाता है। विकारयुक्त आकाश सेसब प्रकार केगन्ध को वहन करनेवालेपवित्र वायु की उत्पत्ति होती हैजिसका गुण स्पर्शहोता है॥ ७५-७६ ॥
ज्योतिरुत्पद्यतेभात्वतद्रूपगुणमुच्यते॥ ७७ ॥
अद्भ्यो गंधगुणा भूमिरित्येषा सृष्टिरादितः ॥ ७८॥
शब्दार्थः -विकारवान्वायुसेअन्धकार को दूर करनेवालेप्रकाशयुक्र तेज को उत्पत्ति होती हैजिसका गुण रूप है। विकारयुक्त तेज सेजल उत्पन्न होता हैजिसका गुण रस है। जल सेगंध गुण वाली पृथ्वी उत्पन्न होती है। इसी प्रकार आद सेसृष्टिक्रम होता है॥७७ - ७८ ॥
तदेकसप्ततिगुणंमन्वन्तरमिहोच्यते॥ ७९ ॥
क्रीडन्निवैतत्कुरुतेपरमेष्ठी पुनः पुनः ॥ ८० ॥
शब्दार्थ:- बारह हजार वर्षका देकताओ ंका पूर्वमेंयुग बताया गया है , उसकेहकहत्तर गुने ( ८५२००० ) वर्षका एक मन्वन्तर कहा गया है। एक मन्वन्तर पर्यन्त एक ही मनुकेहाथ मेंसृष्टि - संचालन का भार रहता है। मन्वन्तर और उत्पत्ति - प्रलय असंख्य हैं। ( परमधाम निवासी ) परमेष्टी अर्थात्परमात्मा यह सब खेल की तरह बारम्बा र करतेरहतेहैं॥ ७९-८० ॥
नाधर्मेणागमः कश्चिन्मनुष्यान्प्रति वर्तते॥ ८१ ॥
चौरिकानृतमायाभिर्धर्मश्चापैति पादशः ॥ ८२ ॥
शब्दार्थ:-कृ तयुग (सतयुग ) मेंधर्मसर्वांगपूर्णचारों चरणों मेंरहता है। सत्य के रहनेसेकोई मनुष्य किसी केसाथ अधर्मनहीं करता । अन्य युगों मेंअधर्मपूर्वक धन विद्यादि केअर्जन सेधर्मका बल घटता जाता है। चोरी मिथ्या और कपट सेक्रमशः धर्मकेएक - एक चरण का ह्रा स होता है। इस प्रकार त्रेता मेंधर्मकेतीन चरण, द्वापर मेंदो चरण और कलियुग मेंधर्मका एक ही चरण शेष रहता है॥ ८१-८२ ॥
कृ तेत्रेतादिषुह्येषामायुर्ह्रसति पादशः ॥ ८३ ॥
फलन्त्यनुयुगंलोकेप्रभावाच्च शरीरिणाम्॥ ८४ ॥
शब्दार्थ:-कृ तयुग मेंमनुष्य धर्माचरण पूर्वक सब मनोरथ सिद्ध करते हुयेनिरोग होकर चार सौ वर्षपर्यन्त जीवित रहतेहैं। त्रेता , द्वापर और कलियुग मेंधर्मका ह्रा स होता है। संसार मेंप्राणियों की वेदोक्त आयु , कर्मों केफल और शाप - अनुग्रह आदि केप्रभाव सेयुग - धर्मानुकु ल ही प्राप्त होती है॥ ८३ - ८४ ॥
अन्येकलियुगेनृणांयुगह्रा सानुरूपतः।। ८५ ॥
द्वापरेयज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे॥ ८६ ॥
शब्दार्थ:- कृ तयुग , त्रेता , द्वापर और कलियुग मेंधर्मभिन्न भिन्न होता हैअर्थात्युगों केह्रा स क्रम सेउनकेयुग धर्मका भी ह्रा स होता जाता है। कृ तयुग मेंतप , त्रेता मेंज्ञान , द्वापर मेंयज्ञ और कलियुग मेंदान प्रधान धर्म कहा गया है॥ ८५- ८६ ॥
मुखबाहुरुपज्जाना पृथक्कर्माण्यकल्पयत्।। ८७ ॥
दानंप्रतिग्रहंचैव ब्राह्मणानामकल्पयत्॥ ८८ ॥
शब्दार्थ:- सम्पूर्णविश्व के रक्षार्थपरमतेजस्वी ब्रह्माजी नेमुख, बाहु , जंघा और चरण सेउत्पन्न होनेवालेप्राणियों के भिन्न - भिन्न कमों की परिकल्पना की है। ब्राह्मणों के लियेपठन पाठन , यज्ञ करना, यज्ञ कराना , दान लेना और दान देना येछः कर्मनिश्चित कियेगयेहैं॥ ८७ - ८८ ॥
विषयेष्वप्रशक्ति श्च क्षत्रियस्य समासतः ॥ ८९ ॥
वाणिज्यंच कु सीदंच वैश्यस्य कृषिमेव च ॥ ९० ॥
शब्दार्थ:- क्षत्रियों के लियेसंक्षेप मेंप्रजा की रक्षा , दान करना , यज्ञ करना , पढ़ना विषयों अर्थात्गीत , नृत्यादि मेंअनुरक्ति न होना , येपाँच कर्मनिश्चित कियेगयेहै। पशुओं - पालन , दान देना , यज्ञ करना , पढ़ना , व्यवसाय करना , सूद व्याज पर रुपया देना और खेती करना ये वैश्यों केकर्महैं॥ ८९ - ९० ॥
एतेषामेव वर्णानांशुश्रूषामनसूयया ॥ ९१ ॥
तस्मान्मेध्यमंत्वस्य मुखमुक्तंस्वयंभुवा ॥ ९२ ॥
शब्दार्थ:-उपर्युक्त तीनों वर्णों का गुणानुवाद करतेहुयेसेवा करना यह एक ही कमेशूद्रो के लियेब्रह्मा द्वारा निर्धारित किया गया है। नाभि सेऊपर पुरुष अत्यन्त पवित्र माना गया है , उसमेंभी सबसे पवित्र ब्रह्मा जी नेमुख को माना है॥
सर्वस्षै वास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः ॥ ९३ ॥
हव्यकव्याभिवाह्याय सर्वस्यास्य च गुप्तये॥९४ ॥
शब्दार्थ:-धर्मसेब्राह्मण ही उत्तमाँग मुख सेउत्पन्न होनेऔर वेद को धारण करनेकेकारण समस्त जगत का स्वामी है। उसेही सर्वप्रथम ब्रह्मा नेतप करके उसेदेवगण और पितरों को हव्य - कव्य पहुंचानेको उत्पन्न किया है॥ ९३ - ९४ ॥
कव्यानि चैव पितरः किं भूतमधिकं ततः ॥ ९ ५ ॥
बुद्धिमत्सुनराः श्रेष्ठाः नरेषुब्राह्मणाः स्मृताः ॥ ९३ ॥
शब्दार्थ:- जिसकेमुख सेदेवगण हव्य और पितृगण कव्य खातेहैं , भला उससे ( ब्राह्मण से ) कौन प्राणी श्रेष्ठ हो सकता है ? भूतों ( स्थावर जंगम रूप पदार्थों ) में ( कीटादि ) श्रेष्ठ हैं , प्राणियों मेंबुद्धि सेव्यवहार करने वालेपशुआदि श्रेष्ठ हैं ; बुद्धि मान जीवों मेंमनुष्यों मेंब्राह्मण ( यज्ञ - योगादि कर्मों केकरनेसे ) श्रेष्ठ कहेगयेहैं॥ ९५ - ९६ ॥
कृ तबुद्धिषुकर्तारः कर्तृषुब्रह्मवेदिनः ॥ ९७ ॥
स हि धर्मार्थमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ ९८ ॥
शब्दार्थ:-ब्रह्माणों मेंविद्वान , विद्वानों मेंकृ तबुद्धि ( शास्त्रोक्त अनुष्ठानों मेंकर्तव्य बुद्धि वाले ) इनसेकर्मकरनेवालेऔर इनसेब्रह्म ज्ञानी श्रेष्ठ होते हैं। ब्राह्मण जन्मजात धर्मकी शाश्वत मूर्ति है , वह धर्मके लियेही उत्पन्न होता है। इसलियेवह मोक्ष प्राप्त करनेमेंसमर्थहोता है॥ ९७ - ९८ ॥
ईश्वरः सर्वभूतानांधर्मकोशस्य गुप्तये॥ ९९ ॥
श्रेष्ठ्येनाभिजनेनेदंसर्वंवैब्राह्मणोऽर्हति ॥ १०० ॥
शब्दार्थ:-ब्राह्मण ही इस पृथ्वी पर सबसेश्रेष्ठ उत्पन्न होता है। वह सभी प्राणियों केधर्मकोश की रक्षा मेंसमर्थहै। इससंसार मेंजो कु छ हैवह सब धर्मब्राह्मणों का हैक्योंकि सबसेश्रेष्ठ उत्पत्ति होनेकेकारण वह ही इसका अधिकारी है॥ ९९ - १०० ॥
आनृशंस्यादब्राह्मणस्य भूञ्जतेहीतरेजनाः ॥ १०१ ॥
स्वायंभुवो मनुर्धीमानिदंशास्त्रमकल्पयत्॥ १०२ ॥
शब्दार्थ:- ब्राह्मण अपना ही खाता है , अपना ही पहनता हैऔर अपना ही दान देता हैअर्थात्दूसरेका अन्न , धन वस्त्रादि सब ब्राह्मण का ही है।
ब्राह्मण ही की कृ पा सेअन्य लोग पदाथों को भोग करतेहैं। ब्राह्मण और अन्य वर्णों केकर्मों को जाननेके लियेही बुद्धि मान स्वायंभुव मनुनेइस शास्त्र की रचना को है॥ १०१ - १० २ ॥
शिष्येभ्यश्च प्रवक्तव्यंसम्यङ्नान्येन के नचित्॥ १०३ ॥
मनोवाग्देहजैर्नित्यंकर्मदोषैनेलिप्यते॥ १०४ ॥
शब्दार्थ:-विद्वान ब्राह्मण इस शास्त्र को भली - भाँति पढ़े और यत्न पूवक
शिष्यों केअतिरिक्त किसी दूसरेको न पढा़वे। इसका अध्ययन करनेवाला
और इसकेअनुसार अनुष्टान करनेवाला ब्राह्मण मन, वचन और शरीर से होनेवालेनित्य कर्मों केदोषों सेरहित होता है॥ १०३ - १०४ ॥
पृथिवीमपि चैवेमांकृत्स्ना मेकोऽपि सोऽर्हति।। १०५ ॥
इदंयशस्यमायुष्यमिदंनिःश्रेयसंपरम्॥ १०६ ॥
शब्दार्थ:- इसका ( मनुस्मृति का ) अध्ययन करनेबाला व्यक्ति अपवित्र को पवित्र करता है। वह अपनेसात पीढी पीछेकेलोगों को और सात आगे होनेवालेलोगों का उद्धार करता है। वह अके ला ही इस सम्पूर्णपृथ्वी का उद्धार करनेयोग्य होता है। यह श्रेष्ठ शास्त्र कल्या ण को देनेवाला , बुद्धि को बढ़ा नेवाला , यश को देनेवाला आयुष्य को देनेवाला और मुक्ति को देनेवाला है॥ १०५ - १०६ ॥
चतुर्णामपि वर्णानामा चारश्चैव शाश्वतः ॥ १०७ ॥
तस्मादस्मिन्सदा युक्तो नित्यंस्यादात्मवान्द्विजः ॥१o८॥
शब्दार्थ:-इस शास्त्र मेंसम्पूर्णधर्म , कर्मों केगुण दोष हैंऔर चारों वर्णों केधर्मएवंआचार भी कहेगयेहैं। वेद और स्मृति में कहा हुआ आचार ही परम धर्महैइसलियेआतमोन्नति चाहनेवाले ब्राह्मण को हमेशा आचार युक्त रहना चाहिये॥ १०७ - १०८ ॥
आचरेण तुसंयुक्तः संपूर्णफल भाग्भवेत्॥ १०९ ॥
सर्वस्य तपसो मूलमाचारंजगृहुः परम्।।११०।।
शब्दार्थ:- आचार हीन ब्राह्मण को वेद का फल नहीं होता है और आचार युक्त ब्राह्मण वेद केसम्पूर्णफल को पाता है। मुनियों नेआचार सेही सब धर्मों की गति देखकर आचार को ही सभी तपों का मूल माना है॥ १०९ - ११० ॥
शब्दार्थ:-जगत की उत्पत्ति , संस्का र की विधि , व्रतचर्याकी विधि एक सेदो अध्यायों तक मेंवर्णन है। इसकेबाद विवाह , विवाह केलक्षण, महायज्ञ का विधान और नित्य श्राद्ध विधि का उल्लेखल्ले है॥ १११ ११२ ॥
भक्ष्या भक्ष्यं च शौचंद्रव्याणांशुद्धिमेव च ॥ ११३ ॥
राजश्च धर्ममखिलंकार्याणांच विनिर्णयम्॥ ११४ ॥
शब्दार्थ:-जीविका केलक्षण स्ना तक ( गृहस्थ आश्रम मेंप्रवेश करनेवाले ) केव्रतों के नियम , भक्ष्य , अभक्ष्य , शौच और द्रव्यों की शुद्धि । तत्पश्चात्क्रमशः स्त्रि यों केधर्म , तप , मोक्ष , सन्यास , राजाओ ंकेसम्पूर्णधर्मऔर राज कार्यों का विशेष निर्णयादि कहेगयेहैं॥ ११३ - १ १४ ॥
विभागधर्मंद्यूतंच कण्टकानांच शोधनम्॥ ११५ ॥
आपद्धर्मंच वर्णानांप्रायश्चित्तविधिं तथा।। ११६ ॥
शब्दार्थ:- साक्षि प्रश्न विधि ‘ स्री पुरुष केधर्म , विभाग ( उत्तराधिकार ) धर्म , जुआ और मार्गकेकं टक शोधन का वर्णन है। वैश्य तथा शूद्रों के कर्म , वर्णसंकर जातियों की उत्पत्ति , आपत्ति काल मेंधर्मऔर वर्णों ( चारों वर्णों ) की प्रायश्चित विधि का उल्लेखल्ले है॥ ११५ - ११६ ॥
निःश्रेयसंकर्मणांच गुणदोषपरीक्षणम्॥ ११७ ॥
पाखण्डगणधर्मांश्च शास्त्रेऽस्मिन्नुक्तवान्मनुः।। ११८ ॥
शब्दार्थ:- कर्मों केद्वारा उत्पन्न तीन श्रेणी उत्तम , मध्यम , निकृष्ठ शरीर की प्राप्ति , मुक्ति केसाधन और कर्मो केगुण दोष की परीक्षा , देश धर्म जातियों केधर्म , पाखण्डियों केधर्मइस शास्त्र मेंमहर्षि मनुजी नेकहेहैं॥ ११७ -११८ ॥
तथेदंयुयमप्यद्य मत्सकाशान्निबोधत ॥ ११९ ॥
शब्दार्थ:- मनुजी नेमेरेद्वारा प प्रश्न करनेपर पूर्वकाल में जिस प्रकार इस शास्त्र को कहा था , उसी प्रकार आप लोग
भी आज मुझसेश्रवण करें॥ ११९ ॥

